
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति ने हाल ही में हुई बैठक में रेपो रेट को अपरिवर्तित (Unchanged) रखने का निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद वित्तीय गलियारों में इसके पीछे की रणनीतियों और भविष्य के आर्थिक संकेतों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। आखिर केंद्रीय बैंक ने फरवरी में इस दर को स्थिर रखने का फैसला क्यों किया? आइए विस्तार से समझते हैं।
बदलाव न करने के पीछे के मुख्य कारण
देश के प्रमुख वित्तीय संस्थानों और विश्लेषकों ने इस फैसले को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा है:
• संतुलित आर्थिक रास्ता: ‘इनक्रेड मनी’ के विश्लेषण के अनुसार, RBI वर्तमान में एक संतुलित रास्ते पर चल रहा है। फरवरी में रेपो रेट को स्थिर रखने का सबसे बड़ा कारण यह है कि फिलहाल घरेलू हालात, देश की ग्रोथ (विकास दर) और महंगाई की स्थिति अनुकूल बनी हुई है।
• आर्थिक रफ्तार पर अटूट विश्वास: ‘बजाज ब्रोकिंग रिसर्च’ ने इस कदम को भारतीय आर्थिक रफ्तार के प्रति आत्मविश्वास का संकेत माना है। दरें न बढ़ाना इस बात की पुष्टि करता है कि अर्थव्यवस्था सही दिशा में बढ़ रही है।
• ग्रोथ पर ध्यान केंद्रित करना: ‘टाटा कैपिटल’ के मुताबिक, केंद्रीय बैंक का यह फैसला स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि RBI का पूरा फोकस आर्थिक विकास (Growth) को बनाए रखने पर है।
आम जनता और निवेशकों के लिए इसका क्या मतलब है?
जब RBI रेपो रेट में बदलाव नहीं करता, तो इसके सीधे प्रभाव हमें बाजार में देखने को मिलते हैं:
1. लोन की ईएमआई (EMI): चूंकि रेपो रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है, इसलिए आपके होम लोन या कार लोन की ब्याज दरों में फिलहाल कोई बड़ा इजाफा होने की संभावना कम है।
2. बाजार में स्थिरता: आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि दरों को स्थिर रखना बाजार में अनिश्चितता को कम करता है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ता है।
3. महंगाई पर नियंत्रण: विकास को प्राथमिकता देते हुए RBI महंगाई पर भी बारीकी से नजर रखे हुए है ताकि आम जनता की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, RBI का यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती और स्थिरता को ध्यान में रखकर लिया गया है। जहाँ एक ओर यह विकास दर को रफ्तार देने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर यह घरेलू बाजार की स्थितियों को स्थिर रखने का एक सधा हुआ प्रयास भी है।
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