
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026 पेश करते हुए देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा एक अहम ऐलान किया है। उन्होंने बताया कि सरकार ने वित्त वर्ष 2026–27 में देश के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.3 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है। यह फैसला सरकार की वित्तीय अनुशासन, कर्ज नियंत्रण और संतुलित खर्च नीति को दर्शाता है।
राजकोषीय घाटा क्या होता है?
राजकोषीय घाटा उस स्थिति को कहा जाता है जब सरकार का कुल खर्च उसकी कुल आय से अधिक हो जाता है। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधार लेना पड़ता है। ज्यादा राजकोषीय घाटा अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है, जबकि नियंत्रित घाटा आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए जरूरी माना जाता है।
मौजूदा वित्त वर्ष में स्थिति
वित्त मंत्री ने जानकारी दी कि चालू वित्त वर्ष (2025–26) में राजकोषीय घाटा 4.4 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऐसे में अगले वित्त वर्ष में इसे घटाकर 4.3 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य यह दिखाता है कि सरकार धीरे-धीरे घाटे को कम करने की रणनीति पर काम कर रही है।
यह कदम खास तौर पर ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बनी हुई है और कई देश उच्च कर्ज व महंगाई से जूझ रहे हैं।
सरकार का फोकस: कर्ज नियंत्रण और संतुलित खर्च
बजट भाषण में वित्त मंत्री ने साफ किया कि सरकार का मुख्य फोकस तीन बातों पर है:
कर्ज पर नियंत्रण – अनावश्यक उधारी से बचना पूंजीगत खर्च में वृद्धि – इंफ्रास्ट्रक्चर, परिवहन और विकास परियोजनाओं पर निवेश राजस्व और खर्च के बीच संतुलन – ताकि विकास भी हो और वित्तीय अनुशासन भी बना रहे
सरकार का मानना है कि अगर खर्च सही क्षेत्रों में किया जाए, तो आर्थिक विकास को गति देने के साथ-साथ घाटे को भी नियंत्रित रखा जा सकता है।
आर्थिक विकास पर क्या असर पड़ेगा?
विशेषज्ञों के अनुसार राजकोषीय घाटे को सीमित रखने से:
निवेशकों का भरोसा बढ़ता है ब्याज दरों पर दबाव कम होता है रुपये की स्थिरता बनी रहती है लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था मजबूत होती है
सरकार का लक्ष्य है कि विकास और स्थिरता दोनों साथ-साथ चलें। इसी वजह से सामाजिक योजनाओं के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर और रोजगार सृजन पर भी जोर दिया जा रहा है।
कोविड के बाद संतुलन की कोशिश
कोविड-19 महामारी के दौरान सरकार को भारी खर्च करना पड़ा था, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ा। लेकिन अब हालात सामान्य होने के साथ-साथ सरकार फिर से Fiscal Consolidation यानी घाटा कम करने की नीति पर लौट रही है।
4.3 प्रतिशत का लक्ष्य यह संकेत देता है कि सरकार धीरे-धीरे महामारी के बाद की वित्तीय चुनौतियों से बाहर निकलने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
भविष्य की रणनीति
सरकार आने वाले वर्षों में राजकोषीय घाटे को और कम करने की योजना पर काम कर सकती है। इसके लिए:
टैक्स कलेक्शन बढ़ाने डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूत करने सरकारी संपत्तियों के बेहतर उपयोग और खर्च की गुणवत्ता सुधारने
जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
आम जनता के लिए क्या मायने?
आम लोगों के लिए यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि नियंत्रित राजकोषीय घाटा:
महंगाई को काबू में रखने में मदद करता है भविष्य में टैक्स का दबाव कम कर सकता है अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाता है
हालांकि, सरकार के सामने यह चुनौती भी रहेगी कि कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर खर्च में कटौती किए बिना घाटे को कैसे नियंत्रित रखा जाए।
निष्कर्ष
वित्त वर्ष 2026–27 में राजकोषीय घाटा 4.3 प्रतिशत रखने का लक्ष्य सरकार की जिम्मेदार और संतुलित आर्थिक नीति को दर्शाता है। यह कदम न केवल भारत की आर्थिक साख को मजबूत करेगा, बल्कि आने वाले समय में स्थिर और टिकाऊ विकास की नींव भी रखेगा।
बजट 2026 से साफ है कि सरकार विकास और अनुशासन—दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है, जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है।